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हम और हमारी देशी गाये

नमस्कार दोस्तों , आज हम अपना पहला ब्लॉग लिखने की कोसिस कर रहे है, आशा करते है आप ये पहल अच्छी लगेगी और हम निरंतर
आप लोगो के प्रश्नो के उत्तर देने की कोसिसि करेँगे। हमारा आज का टॉपिक है।
“हम और हमारी देशी गाये “
हम सब भारत वाशी है और किसी भी युग की बात क्यों न करे , सतयुग ,द्वपार या फिर कलयुग हर युग मे हमारी गाये को माता का रूप मन गया है। अब सवाल उठता है ऐसा क्यों। ..?
क्योंकि जिस प्रकार एक माता अपने बच्चों का भरण पोषण बिना किसी स्वार्थ के करती है और अपने आखरी समय तक अपने बच्चो के हिट के बारे मई ही सोचती है उसी प्रकार हमारी देशी गौमाता भी अपने दूध , गोबर मूत्र से सभी प्रकार से हम भारतवाशियों को हमेशा लाभान्वित करती आयी है। हाँ ये प्रश्न विचारणीय है की इन सभी लाभों को लेने के उपरांत हम भारतवाशियों ने गौमाता को काया है। सिर्फ सड़को पर तिरिस्कार।।
चलिए आगे बढ़ते है। पुराने समय मे हमारे देश मैं हर आँगन मे देशी गाय जरूर होती थी। जिसके पास जितनी गैया होती थी वो वयक्ति या राजा उतना ही समर्द्धशाली माना जाता था। गौदान सबसे बड़ा दान हुआ करता था , कहा जाता है। जब श्री राम जी को वनवास हुआ ,वन से जाने से पहले उनके पास एक गरीब ब्राह्मण भिक्षा ममांगने आये , श्री राम जी ने उस ब्राह्मण से कहा तुन जंहा तक ये लाठी फेंक दोगे वंहा तक की गगये आपको दान दे दूंगा। उस गरीब ब्राह्मण ने महल से सरयूं नदी के पार तक लाठी फेंक दी। तब श्रीराम जी ने उन्हें वंहा तक की लाखो गाये ब्राह्मण को दान दी। मेरे कहने का अर्थ है की हर युग मे। भारतीय नस्ल की गाये पूजनीय रही है. हमारा देश मे दूध व् घी की नदिया बहा करती थी. लोगो की आर्थिकी गाये पर निर्भर होती थी।

खेत मे बैल हो , देशी उर्वरक हो , गाये का पंचगव्य सब दूध ,घी ,दही गोबर ,गौमुत्र ये सब मानव जीवन का हिस्सा थे। इसलिए गौमाता को देवता समतुल्य माना जाता था.

दीपक त्यागी
आयुष्काम आर्गेनिक फार्म
रूरकी हरिद्धार